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हिन्दुत्व को प्राचीन काल में सनातन धर्म कहा जाता था। हिन्दुओं के धर्म के मूल तत्त्व सत्य, अहिंसा, दया, क्षमा, दान आदि हैं जिनका शाश्वत महत्त्व है। अन्य प्रमुख धर्मों के उदय के पूर्व इन सिद्धान्तों को प्रतिपादित कर दिया गया था। इस प्रकार हिन्दुत्व सनातन धर्म के रूप में सभी धर्मों का मूलाधार है क्योंकि सभी धर्म-सिद्धान्तों के सार्वभौम आध्यात्मिक सत्य के विभिन्न पहलुओं का इसमें पहले से ही समावेश कर लिया गया था। मान्य ज्ञान जिसे विज्ञान कहा जाता है प्रत्येक वस्तु या विचार का गहन मूल्यांकन कर रहा है और इस प्रक्रिया में अनेक विश्वास, मत, आस्था और सिद्धान्त धराशायी हो रहे हैं। वैज्ञानिक दृष्टिकोण के आघातों से हिन्दुत्व को भयभीत होने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि इसके मौलिक सिद्धान्तों का तार्किक आधार तथा शाश्वत प्रभाव है।

आर्य समाज जैसे कुछ संगठनों ने हिन्दुत्व को आर्य धर्म कहा है और वे चाहते हैं कि हिन्दुओं को आर्य कहा जाय। वस्तुत: ‘आर्य’ शब्द किसी प्रजाति का द्योतक नहीं है। इसका अर्थ केवल श्रेष्ठ है और बौद्ध धर्म के चार आर्य सत्य की व्याख्या करते समय भी यही अर्थ ग्रहण किया गया है। इस प्रकार आर्य धर्म का अर्थ उदात्त अथवा श्रेष्ठ समाज का धर्म ही होता है। प्राचीन भारत को आर्यावर्त भी कहा जाता था जिसका तात्पर्य श्रेष्ठ जनों के निवास की भूमि था। वस्तुत: प्राचीन संस्कृत और पालि ग्रन्थों में हिन्दू नाम कहीं भी नहीं मिलता। यह माना जाता है कि परस्य (ईरान) देश के निवासी ‘सिन्धु’ नदी को ‘हिन्दु’ कहते थे क्योंकि वे ‘स’ का उच्चारण ‘ह’ करते थे। धीरे-धीरे वे सिन्धु पार के निवासियों को हिन्दू कहने लगे।

हिन्दुत्व एक उद्विकासी व्यवस्था है जिसमें अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता रही है। इसे समझने के लिए हम किसी एक ऋषि या द्रष्टा अथवा किसी एक पुस्तक पर निर्भर नहीं रह सकते। यहाँ विचारों, दृष्टिकोणों और मार्गों में विविधता है किन्तु नदियों की गति की तरह इनमें निरन्तरता है तथा समुद्र में मिलने की उत्कण्ठा की तरह आनन्द और मोक्ष का परम लक्ष्य है।
हिन्दुत्व एक जीवन पद्धति अथवा जीवन दर्शन है जो धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष को परम लक्ष्य मानकर व्यक्ति या समाज को नैतिक, भौतिक, मानसिक एवं आध्यात्मिक उन्नति के अवसर प्रदान करता है। हिन्दू समाज किसी एक भगवान की पूजा नहीं करता, किसी एक मत का अनुयायी नहीं हैं, किसी एक व्यक्ति द्वारा प्रतिपादित या किसी एक पुस्तक में संकलित विचारों या मान्यताओं से बँधा हुआ नहीं है। वह किसी एक दार्शनिक विचारधारा को नहीं मानता, किसी एक प्रकार की धार्मिक पूजा पद्धति या रीति-रिवाज को नहीं मानता। वह किसी धर्म या सम्प्रदाय की परम्पराओं की संतुष्टि नहीं करता है।

आज हम जिस संस्कृति को हिन्दू संस्कृति के रूप में जानते हैं और जिसे भारतीय या भारतीय मूल के लोग सनातन धर्म या शाश्वत नियम कहते हैं वह उस मजहब से बड़ा सिद्धान्त है जिसे पश्चिम के लोग समझते हैं । कोई किसी भगवान में विश्वास करे या किसी ईश्वर में विश्वास नहीं करे फिर भी वह हिन्दू है।

यह एक जीवन पद्धति है; यह मस्तिष्क की एक दशा है। हिन्दुत्व एक दर्शन है जो मनुष्य की भौतिक आवश्यकताओं के अतिरिक्त उसकी मानसिक, बौद्धिक एवं आध्यात्मिक आवश्यकता की भी पूर्ति करता।

हिंदुस्तान क्या है? हिन्दू कौन है? कौन नहीं है?

मैं विनायकराव दामोदर सावरकर के १९२३ में लिखे एक लेख ‘हिंदुत्व’ से कुछ मूल बातों की बात यहाँ करूंगी।

लेख की शुरुआत में ही सावरकर ये बात साफ़ कर देते हैं की हिन्दू-धर्म एक पेड़ ‘हिंदुत्व’ की शाखा है| उन्होनें इस बात को महत्त्व दिया है की बिना हिंदुत्व को समझे एक ‘हिन्दू’ या ‘हिन्दू-धर्म’ को समझना नामुमकिन है| संस्कृत भाषा में ‘सिंधु’ सिर्फ एक नदी नहीं बल्कि समुद्र भी है – तो सिर्फ इस एक शब्द ‘सिन्धुस्तान’ (हिंदुस्तान) से हम उस देश को परिभाषित कर सकते हैं जिसमें ‘हिन्दू’ जाति के लोग कई हज़ार सालों से बसे हैं| हिन्दू जाति के लोग किसी भी धर्म को मानने वाले या नास्तिक होते हैं|

सावरकर के अनुसार हिन्दू होने के लिए किसी भी इंसान को ३ कसौटियों पर खरा उतरना पड़ेगा:

क. उसकी रगों में किसी ‘हिन्दू’ का खून दौड़ रहा हो| हिन्दू एक जाति है जिसकी शुरुआत वेद-युग के भी पूर्व हुई है|

ख. हिन्दुस्तान (जो सिंधु नदी से लेकर समुद्रों तक फैला है) को अपनी पितृभूमि समझता हो जहाँ से उसके पूर्वज हों|

ग. सांस्कृतिक तौर पर हिंदुस्तान का हो| हिन्दुस्तान की सर-ज़मीन को पावन धरती की तरह पूजता हो|

इतिहास के पन्नों में यह बात दर्ज है की हर विचारधारा को समय-समय पर अलग-अलग आकारों में ढ़ाला गया है| मेरा मानना है की इस सदी में, हम में से जो ज्ञानी ‘हिंदुत्व’ में अटल विश्वास रखते हैं वो किसी भी तरह की विदेशी विचारधारा का विरोध करते हैं| ऐसा ठीक ही है क्योंकि आखिरकार एक विदेशी श्रद्धा (इस्लाम) की बदौलत ही १९४७ में हमारी ज़मीन का एक हिस्सा छीन लिया गया और उसे पाकिस्तान बनाया गया| एक विदेशी सोच (माओवाद) की बदौलत ही आज हमारे देश में नक्सल्वाद इतनी बड़ी समस्या है।

हिंदुस्तान की सामाजिक और राजनीतिक समस्याएं समय के साथ बदलती रहेंगी पर इसका समाधान हिंदुत्व के लगातार संशोधन और विस्तार में ही मिलेगा।

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6 thoughts on “हिन्दुत्व क्या है ?

  1. Hi Shraddha Ji, I received your mail stating “Want to advertise my personal blog,
    immortalsoul2017.wordpress.com”

    I am adding your link to my blog “https://thehinduorg.blogspot.com/” and also please send me article based on the theme of your site. I will post the same on my blog.. Thank you

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  2. सनातन संस्कृति है, हिंदू धर्म है।
    विश्व कि चार पुरातन संस्कृति रोम, मिस्र, यूनान और सनातन है। जिसमें से केवल सनातन संस्कृति आज पूरे विश्व चम-चम चममा रही है। बाकि की तीनों संस्कृतियों को पाश्चात्य संस्कृति द्वारा नष्ट कर दिया गया है। अब सनातन संस्कृति के उपर “धर्मांतरण” का गंदा खेल खेलकर हमारी संस्कृति को नष्ट करने कि कोशिश हो रही है। आज विश्व में हिन्दू धर्म तीसरे स्थान पे है, केवल धर्मांतरण के चलते।
    लेकिन आज सनातन संस्कृति सुरक्षित है तो केवल संतों के चलते।

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