हम सभी अक्सर इस असमंजस में रहते हैं कि देश बड़ा होता है या धर्म। इसे समझने के लिए यह जानना आवश्यक है कि धर्म क्या है और राष्ट्र क्या है।

धर्म एक रहस्य है, संवेदना है, संवाद है और आत्मा की खोज है। धर्म जीवन जीने का तरीका है। धर्म स्वयं की खोज का नाम है। कोई शक्ति है या कोई रहस्य है। धर्म है अनंत और अज्ञात में छलांग लगाना। धर्म है जन्म, मृत्यु और जीवन को जानना। धर्म निराकार परम ब्रह्म की प्राप्ति का मार्ग है

राष्ट्र / देश कहते हैं, एक जन समूह को, जिनकी एक पहचान होती है, जो कि उन्हें उस राष्ट्र से जोङती है। इस परिभाषा से तात्पर्य है कि वह जन समूह साधारणतः समान भाषा, धर्म, इतिहास, नैतिक आचार, या मूल उद्गम से होता है।

ईश्वर ने ब्रह्मांड रचना की , हमारी धरती की रचना की, जीवन दिया। ईश्वर को हम कई बार प्रकृति भी कह देते हैं। प्रकृति ही सारे कर्म करती है, जीव तो निमित्त मात्र है। इसीलिए श्री कृष्ण ने श्रीमदभगवद्गीता में अध्याय 3,श्लोक 27 में कहा है,

प्रकृतेक्रियमाणणी गुणे कर्माणि सर्वश: अहंकारे विमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते।।

तो क्या राष्ट्र का कोई महत्व नहीं?

धर्म का महत्वपूर्ण होना ही यह समझने के लिए पर्याप्त है राष्ट्र का महत्व मानव जीवन में कितना अधिक है। बिना धर्म के राष्ट्र की कल्पना नहीं की जा सकती। बिना धर्म के राष्ट्र का अस्तित्व नहीं। राष्ट्र बिना मनुष्य का अस्तित्व नहीं।

राष्ट्र बिना धर्म के जीवित नहीं रह सकता। राष्ट्र बनते बिगड़ते हैं पर राष्ट्रों का निर्माण धर्म ही करता है। राष्ट्र की आत्मा प्राण है। बिना धर्म के राष्ट्र मृत प्राय है। उदाहरण – भारत कभी ईरान तक था आर्यावर्त भी कभी विस्तृत भूभाग तक था ईरान से इंडोनेशिया और मॉरिशस से मास्को तक आर्यावर्त था पर धर्म सिकुड़ता गया राष्ट्र बंटता गया। जहाँ धर्म बचा रहा वो भाग आज भारत का भाग है। जहाँ धर्म लुप्त है, जैसे कश्मीर व पूर्वोत्तर भारत, उस भाग के भारत से अलग होने के षड्यंत्र चलते रहते है। अन्य उदाहरण – यहूदियो का राज्य था इजराइल जहाँ से उन्हें ईसाइयो ने मार कर भगा दिया। रोमनों ने भी उन पर अत्याचार किये। फिर मुसलमान आऐ और उन्होने भी यहूदियो पर अत्याचार किये पर यहूदियों ने प्राण दे कर भी धर्म बचाये रखा। यहूदियों ने धर्म की रक्षा करके स्वयं को बचाये रखा और इजराइल की पुनः स्थापना की। उनका धर्म न बचता तो राष्ट्र भी न बचता। इसलिए धर्म सर्वोपरी है।

अब आप सोच रहे होंगे कि हमने तो यही सीखा है कि धर्म अपनी जगह और देश अपनी जगह। यह सही भी है पर जब चुनाव करने की बारी आती है तब हम ‘धर्म संकट’ में आ जाते हैं।

असल में यह विवाद ही व्यर्थ है, क्या आप अपनी माता व पिता में किसी एक को चुन सकते हैं? नहीं न! कुछ ऐसी ही स्थिति धर्म और राष्ट्र के संदर्भ में भी है। हम अपने देश को मातृभूमि मानते हैं, प्रार्थना भी करते हैं,

नमस्ते सदा वत्सलमातृभूमे।

या

जननी जन्मभूमीश्च स्वर्गादपि गरीयसि।

या

भारत माता की जय !

राष्ट्र और धर्म एक दूसरे के पूरक हैं। राष्ट्र हमारे लिए माता के समान है जो भरण पोषण करती है, हमें उन्नति के मार्ग पर चलाती है। धर्म हमारे लिए पिता के समान है, जो हमें सुसंस्कृत, सभ्य, बुद्धिमान व शक्तिशाली बनाता है। हमें सही दिशा देता है। हमें अनुशासित करता है।

तो यह स्पष्ट है कि आप देश चुन के धर्म व धर्म चुन के देश के प्रति अपने दायित्व से भाग नहीं सकते।

एक वाक्य में कहूं तो धर्म बड़ा है, पर राष्ट्र प्रथम है। यूं तो चुनाव करने की स्थिति सामान्यतः आती ही नहीं पर अगर आए तो निश्चिंत हो कर राष्ट्र को चुन लीजिएगा। ऐसा करके आप अप्रत्यक्ष रूप से धर्म का ही चुनाव व पालन व रक्षा कर रहे होंगे क्योंकि धर्म ही राष्ट्र की रक्षा करना भी सिखाता है धर्म का एक अभिन्न अंग है राष्ट्रधर्म।

राष्ट्रधर्म का पालन करते हुए अनेक बाधाएँ आयेंगी हो सकता है आपको भी वीर चंदन गुप्ता की तरह प्राण देने पड़ें , पर पीछे न हटना।

लेख का अन्त इस श्लोक से करूंगी,

चला लक्ष्मीश्च चला, चला जीवित मंदिरे

चला चले च संसारे, धर्म एको ही निश्चला ।

– श्रद्धा पाण्डेय

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25 thoughts on “धर्म बड़ा या देश ?

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